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मेरठ के दीपांकर सक्सेना को साइबर अपराध और डीपफेक धोखाधड़ी के तकनीकी समाधानों के लिए 2026 की 'ओक्टा आइडेंटिटी 25' सूची में शामिल किया गया है। वे इस वैश्विक सूची में शामिल होने वाले एकमात्र भारतीय हैं, जिन्होंने डिजिटल पहचान और साइबर सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
SZN MEDIA, मेरठ। साइबर अपराध और डीपफेक आधारित आनलाइन धोखाधड़ी के खिलाफ तकनीकी समाधान विकसित करने वाले मेरठ के मूल निवासी दीपांकर सक्सेना को वर्ष 2026 की प्रतिष्ठित ‘ओक्टा आइडेंटिटी 25’ सूची में शामिल किया गया है।
डिजिटल आइडेंटिटी और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में वैश्विक योगदान देने वाले विश्व के 25 चुनिंदा विशेषज्ञों की इस सूची में इस वर्ष दीपांकर एकमात्र भारतीय हैं। यह सूची चार मई की शाम अमेरिका के न्यूयार्क स्थित टाइम्स स्क्वायर पर जारी की गई, जहां सभी चयनित विशेषज्ञों का वीडियो प्रदर्शन भी किया गया।
वर्तमान में अमेरिका के सोक्योर इंक नामक कंपनी में जीएम व हेड आफ प्रोडक्ट के पद पर कार्यरत दीपांकर सक्सेना ने साइबर सुरक्षा और डिजिटल प्रमाणीकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। इसी वर्ष उन्हें डीपफेक और एआइ आधारित फ्राड को रोकने वाली तकनीक के लिए अमेरिका का पेटेंट भी मिला है।
उनकी विकसित तकनीक मोबाइल डाक्यूमेंट वेरिफिकेशन को अधिक सुरक्षित बनाती है और वाइब्रेशन और एक्सेलेरोमीटर विश्लेषण के माध्यम से नकली या डिजिटल रूप से जोड़े गए चित्रों की पहचान कर लेती है।
बुधवार को मेरठ में आयोजित एक प्रेस वार्ता में दीपांकर के पिता डा. अमरीश सक्सेना ने यह जानकारी दी। उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद से अधिशासी अभियंता पद से सेवानिवृत्त चार्टर्ड इंजीनियर व अप्रूव्ड वैल्यूअर अमरीश सक्सेना व शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी माता डा. साधना सक्सेना का कहना है कि दीपांकर की सफलता उनकी मेहनत, लगन और तकनीकी दृष्टिकोण का परिणाम है।
दीपांकर ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा डीएमए प्रथम मोदीपुरम से पूरी की। उन्होंने वर्ष 2009 में 10वीं और 2011 में 12वीं उत्तीर्ण किया। वर्ष 2015 में वीआइटी यूनिवर्सिटी वेल्लोर से सूचना प्रौद्योगिकी में बीटेक किया। करियर की शुरुआत उन्होंने जोहो कारपोरेशन चेन्नई से की, जहां अपनी प्रतिभा के दम पर मात्र तीन वर्षों में टेक लीड बने।
इसी दौरान अमेरिकी कंपनी सोक्योर ने भारत में अपना कार्यालय शुरू करने की योजना बनाई। दीपांकर ने तकनीकी नेतृत्व के बजाय प्रोडक्ट मैनेजमेंट में रुचि दिखाई, जिसके बाद उन्हें कंपनी के चेन्नई कार्यालय में प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में चुना गया। वर्ष 2022 में उन्होंने अमेरिका में कंपनी के साथ नई भूमिका संभाली और वर्तमान में न्यूयार्क के ब्रुकलिन में रहते हुए वैश्विक स्तर पर डिजिटल आइडेंटिटी सुरक्षा समाधानों का नेतृत्व कर रहे हैं।
दीपांकर के अनुसार डिजिटल पहचान केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं बल्कि लोगों के जीवन से जुड़ा मानवीय विषय है। अमेरिका पहुंचने के शुरुआती अनुभवों में पहचान और क्रेडिट हिस्ट्री के अभाव में बैंक खाता खोलने से लेकर किराये पर घर लेने तक कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
इसी अनुभव ने उन्हें ऐसे समाधान विकसित करने के लिए प्रेरित किया जो सुरक्षित होने के साथ-साथ समावेशी भी हों। दीपांकर के अनुसार भविष्य की डिजिटल पहचान प्रणाली ऐसी होनी चाहिए, जिसमें बार-बार दस्तावेज अपलोड करने की आवश्यकता न पड़े और उपयोगकर्ता केवल आवश्यक जानकारी ही साझा करें।
मोबाइल ड्राइविंग लाइसेंस, वेरिफाएबल क्रेडेंशियल्स और वालेट आधारित आइडेंटिटी सिस्टम को वह डिजिटल सुरक्षा का अगला बड़ा परिवर्तन मानते हैं। ओक्टा प्रतिवर्ष ‘आइडेंटिटी 25’ सूची जारी करती है, जिसमें डिजिटल पहचान और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले विशेषज्ञों को सम्मानित किया जाता है।
डिजिटल पहचान में धोखाधड़ी रोकेगी दीपांकर की तकनीक
दीपांकर द्वारा विकसित टेक्नोलाजी डिजिटल पहचान सत्यापन के दौरान होने वाली धोखाधड़ी को रोकने विशेष सुरक्षा प्रणाली विकसित की है। यह आविष्कार विशेष रूप से इमेज इंजेक्शन अटैक की पहचान करने पर केंद्रित है। इस प्रकार के हमले में कोई साइबर अपराधी नकली विजुअल डेटा जोड़कर डाक्यूमेंट स्कैनर या कैमरा सिस्टम को धोखा देने की कोशिश करता है।
इन खतरों की पहचान करने के लिए यह तकनीक मोबाइल डिवाइस में मौजूद एक्सेलेरोमीटर द्वारा रिकार्ड किए गए वास्तविक भौतिक कंपन (फिजिकल वाइब्रेशंस) के विश्लेषण की एक अनूठी विधि का उपयोग करती है। सिस्टम हैप्टिक फीडबैक और डिवाइस की मूवमेंट पैटर्न की निगरानी करके यह पता लगा लेता है कि डाक्यूमेंट की इमेज वास्तव में कैमरे से लाइव कैप्चर की गई है या फिर किसी ने डिजिटल तरीके से नकली डेटा जोड़ने का प्रयास किया है।
अंततः यह तकनीक रिमोट डिजिटल वेरिफिकेशन प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता और सुरक्षा को मजबूत बनाती है, क्योंकि यह सुनिश्चित करती है कि सत्यापन के लिए उपयोग किया गया डेटा किसी वास्तविक भौतिक वातावरण से ही प्राप्त हुआ है।
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